बुक जर्नल द्वारा समीर गांगुली से बातचीत
नमस्कार समीर जी, एक बुक जर्नल में आपका स्वागत है। सर्वप्रथम तो नवीन पुस्तक के प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई। सब अच्छा होगा: एक छोटी-सी डॉक्टर की बड़ी-सी कहानी के विषय में पाठकों को कुछ बताएं।
धन्यवाद विकास जी! इस पुस्तक को प्रकाशित होने में करीब दो-ढाई साल का समय लग गया। इस बीच कुछ नया भी लिखा जा चुका है । बहरहाल, अपने पूर्व- लेखन की समीक्षा करते समय मैंने पाया कि पिछले कुछ उपन्यास आंशिक रूप से या पूर्णत: फैन्टेसी उपन्यास थे। इसलिए सोच लिया था कि इस बार फैन्टेसी से बचना है। दूसरी बात थी कि सभी उपन्यासों के मुख्य किरदार बच्चे थे, सो एक चुनौती यह भी ली कि इस बार किशोर उपन्यास के पात्र बच्चे न होकर बड़े होंगे। लेकिन कहानी किशोरों को आकर्षित करने वाली होगी।
पुस्तक को लिखने का विचार कैसे आया? कोई विशेष बात जिसने पुस्तक को लिखने के लिए उत्प्रेरक का कार्य किया हो?
यह उपन्यास अस्पताल की पृष्ठभूमि पर एक अंडरवेट डॉक्टर और हैवीवेट पेशेन्ट के आपसी रिश्ते पर केन्द्रित कहानी है। मेरे लिए दो चीजें लेखन में उत्प्रेरक का काम करती हैं-एक, अच्छा पढ़ना और दूसरा- बारीकी से अवलोकन। लगता है अस्पताल में किसी रोगी या डॉक्टर को देखकर यह विचार उपजा हो। लेकिन लेखन के इतने लेवल होते हैं कि कई बार मूल कारण या उत्प्रेरण को अलग से देखना संभव नहीं हो पाता।
अक्सर किशोर या बाल साहित्य जब लेखक लिखते हैं तो मुख्य किरदारों को उतनी ही उम्र का बनाते हैं जिसके कि मुख्य पाठकवर्ग होता है। पर आपकी पुस्तक के दोनों किरदार वयस्क हैं। कुछ इस विषय में बताएं। ये निर्णय आपने क्यों लिया?
हां, यह सायास लिया गया निर्णय है। दरअसल मैं लेखन में किसी पैटर्न या ढर्रे के बनने को पसंद नहीं करता। मुझे यह लेखक की खूबी नहीं लगती कि उसके स्टाइल को पाठक भांप ले। मैं अपने लेखन में अन-प्रेडेक्टिबल बनना चाहता हूं।
अच्छा पुस्तक से आपके तरफ चलते हैं। साहित्य के प्रति अनुराग आपके मन में कैसे जागृत हुआ? क्या घर में साहित्य का माहौल था?
मेरा बचपन देहरादून के रायपुर नामक एक टाउनशिप में हुआ। बचपन तिलस्मी था। यार-दोस्त गप्पबाज थे और आसपास के लोगों, जगहों में कहानियां छिपी थी। जगहों के नाम ही देख लीजिए- प्रेमनगर,तपोवन, रांझावाला, आठ नंबर गांव । मेरी मां भी महा-किस्सेबाज थी। हम भाइ;-बहनों को कहानी में इतनी अतिश्योक्ति डालकर सुनाती थी कि मजा आ जाता था। पिताजी बांग्ला साहित्य के अनुरागी थे। उस समय हमारे घर में बांग्ला की मशहूर पत्रिका ‘ देश’ आती थी।
वह कौन से लेखक थे जिनकी रचनाओं ने किस्से कहानियों के प्रति आकर्षित किया??
शुरूआत संभवत: मौखिक रचनाओं यानी लोक कथाओं से हुई। मां और दादी के मुख से ‘‘ठाकुरमार झूली’’ की बांग्ला लोक कथाएं सुनी। बाद में रवीन्द्र नाथ टैगौर,शरद्रचंद्र की रचनाओं ने एक अच्छा पाठक बनने में मदद की।
आपके मन में लिखने का ख्याल कब आया? क्या आपको अपनी पहली लिखी रचना याद है?
पढ़ना-लिखना सीखा, तो पिताजी ने घर में हिन्दी अखबार ‘नवभारत टाइम्स’ लगवा दिया। यह मेरे अखबार से जुड़ाव का पहला कदम था। उसमें बाल जगत नाम से बच्चों की रचनाओं का एक पेज था। उसमें पहली रचना प्रकाशित हुई थी। तब शायद 15/16 वर्ष की उम्र रही होगी। उससे जुड़ा एक वाकया सुनाता हूं। सर्दियों की एक सुबह जब भयानक पाला पड़ा था और गड्ढों में ठहरे पानी पर कांच जैसी परत चढ़ गई थी। एक गिद्ध जमीन पर आ गिरा। वह बुरी तरह जख्मी था। हमारे मोहल्ले के शर्मा जी के पुत्र पप्पू को लगा कि वह मरने वाला है। इसलिए उसकी मुक्ति के लिए उसे कोई प्रार्थना सुनायी जानी चाहिए। वह घर से प्रार्थना की एक किताब ले आया। गिद्ध को नहलाया गया और सब बच्चों ने मिलकर प्रार्थना शुरू की। थोड़ी देर में गिद्ध मर गया। मैंने इसकी एक रिपोर्ट बनाकर नवभारत टाइ्म्स में भेज दी। मैंने यह सवाल उठाया था कि गिद्ध प्रार्थना- पाठ से तर गया या ठंड से मर गया। यह एक बाल सुलभ जिज्ञासा थी। यह रिपोर्ट छपी और पप्पू तीन दिन तक मुझे पीटने के लिए ढूंढता रहा। यह मेरी पहली रचना का पारिश्रमिक था।
प्रथम प्रकाशित रचना कौन सी थी? कहां प्रकाशित हुई थी?
इंटरमीडिएट में आने तक बच्चों की पत्रिकाएं खूब पढ़ने लगा था। जेब खर्च बच्चों की पत्रिकाओं को खरीदने में खर्च हो जाती थी। कबाड़ी बाजार पत्रिकाओं को पाने का सुलभ स्रोत था। बुजुर्ग कबाड़ी भी काफी उदारता दिखाते थे। एक बार चंपक पढ़ने के बाद ना जाने क्यों लगा कि इससे बेहतर तो मैं लिख सकता हूं। बस इसी उत्साह में दो कहानियां लिखकर चंपक को भेज दी। उन कहानियों के नाम थे- कौवे का दुख ; और पहले,सोचो-समझो,फिर करो। दोनों रचनाएं चंपक के एक ही अंक में छप गयी। बस यहीं से शुरूआत हुई। लेकिन, उसके बाद अस्वीकृतियों का एक लंबा सिलसिला चला,जिसने ‘मैं बेहतर हूं’ वाला अहंकार निकाल दिया।
वापस पुस्तक पर आते हैं। अपनी लेखन प्रक्रिया के विषय में बताएं। विचार के आने बाद आपकी लेखन प्रक्रिया क्या रहती है। इस पुस्तक के लिए क्या प्रक्रिया रही थी?
, मेरे मन में कई बार यह प्रश्न उत्पन्न हुआ है कि मैं लिखता क्यों हूं?
और तमाम संभावित जवाबों को खारिज करते हुए मुझे हर बार यही जवाब मिलता है कि आनंद पाने के लिए।
मैंने विधिवत लेखन सन 1973-75 के दौरान किया। शुरूआत बाल साहित्य से की। कुछ समय बाद उस समय की प्रतिष्ठित बाल पत्र पत्रिकाओं में छपने का सिलसिला शुरू हो गया। इनमें से कुछ पत्रिकाएं थीं-चंपक,पराग,लोटपोट, मेला, बालक, मधु मुस्कान तथा दैनिक समाचार पत्रों के रविवारीय परिशिष्ट। जल्द ही एक बाल साहित्यकार के रूप में पहचान भी बनने लगी।
उसी दौरान एक बार पराग के दफ्तर में जाना हुआ। याद नहीं उस समय संपादक कौन होंगे,शायद यह सन 1980 के आसपास का समय होगा। संपादक से मुलाकात करने से पहले मैं उप संपादक की मेज की दूसरी तरफ बैठा था। वो एक आकर्षक, शालीन महिला थी। उन्होंने मुझसे कहा,‘‘ समीर, अब तुम्हारा थोड़ा बहुत नाम होने लगा है। देखना अब जल्द ही तुम बड़ों के लिए लिखने लगोगे। शायद उसमें नाम भी कमाओगे। दरअसल नए लेखक बाल साहित्य को लेखन की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करते हैं।और इससे बाल साहित्य का बहुत नुकसान हो रहा है। उनकी बात मुझे दिल तक छू गई। पच्चीस-छब्बीस साल का नवलेखक थोड़ा भावुक भी होता है। सो मैंने उसी पल खुद से और उनसे वादा किया कि मैं हमेशा केवल बाल साहित्य ही लिखूंगा।
चलिए अब मूल मुद्दे पर आते हैं। यानी मेरे लिखने की प्रक्रिया। मैं लेखक चाहे जैसा भी होऊं, पढ़ाकू अच्छा हूं और अकसर बिना किसी पूर्वाग्रह के। विचारधारा या सोच या जोनर के प्रति भी कोई पूर्वाग्रह नहीं। शुरूआती दौर में यानी जब 25 -40 की उम्र का था,तब नियम बना रखा था कि रोज कम से कम एक कहानी तो पढ़नी ही है और हफ्ते में एक उपन्यास तो पढ़ना ही है। उस दौर, बल्कि उस दौर में हिन्दी, बांग्ला और अंग्रेजी के क्लासिक्स को खोज खोज कर पढ़ा। कई अन्य विदेशी भाषाओं जैसे कि रूसी,चीनी, जर्मन, जापानी आदि के अनुवाद पढ़े। इससे समझ का दायरा बढ़ा। भाषा की नई-नई शैलियों और विषयों से परिचय हुआ।
इससे एक और फायदा यह हुआ कि सामान्य या औसत लेखन से प्रभावित होना छूट गया।
मैं अक्सर अपने लिखे से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाता हूं। कई बार कहानी या उपन्यास के छपने के बाद लगता है, इसे दूसरी तरह से लिखा जाना चाहिए था। कुछ पात्रों की उलट-पुलट भी दिमाग में आती है। शुक्र यह है कि मैं शुरू से ही पढ़े हुए उपन्यासों को याद नहीं रख पाता हूं। इसे मैं ‘Unlearning’ यानी दिमाग को खाली करने का तरीका कह सकता हूं। वैसे यह भुलक्कड़पन नहीं है। अपने लिखे के साथ भी ऐसा ही होता है। मेरी लिखी करीब 30-35 कहानियों का मेरे पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। कुछ कहानियां अचानक से याद आती है, लेकिन उन्हें मैं खो चुका हूं। लेकिन उनके प्रति मन में कोई मोह भी नहीं है,क्योंकि मैं सोचता हूं कि अगर वे उत्कृष्ट कोटि की होती तो पाठक उसे याद रखते, वह पब्लिक डोमेन में कहीं न कहीं तो उपलब्ध होती। हां, कुछ खोई रचनाओं ने फिर से द्वार पर दस्तक दी है।
सोनाली और राधिका देवी के अलावा भी यहाँ काफी किरदार हैं। मुख्य किरदारों के अतिरिक्त कौन सा किरदार आपको पसंद है और क्यों??
जी हां, मैंने ‘‘ सब अच्छा होगा’’ लिखते समय हर किरदार में खुद को देखा है। हर पात्र में मैं स्वयं मौजूद हूं अपनी अच्छाइयों,बुराइयों, खूबियों और खामियों के साथ। इसलिए सबको निरपेक्ष भाव से देखता हूं और छोटे से छोटे पात्र को भी अपना अंश मानकर उसे पसंद करता हूं।
उपन्यास का कोई पहलू या किरदार जिसके विषय में आपको ऐसा लग रहा हो कि कुछ कहना या लिखना छूट गया?
लिखने के बाद उसके मोह से मैं अक्सर निकल जाता हूं। लिखते समय ही उचित शोध करने की कोशिश करता हूं, ताकि ऐसे पछतावे ना हों। हां, पाठक और लेखक मित्रों से इस बारे में सुझाव जरूर मिलते हैं और उन्हें ध्यान में रखता हूं।
उपन्यास का अंत कुछ ऐसे मोड़ पर होता है जिसमें एक मुख्य किरदार के जीवन की एक महत्वपूर्ण समस्या अभी भी बची है? तो क्या इन किरदारों से दोबारा मुलाकात हो सकती है?
कुछ अंदाजा लगाने का काम पाठकों पर भी छोड़ना चाहिए। सब कुछ कह दिया तो दायरा सीमित हो जाता है। अभी तक तो मैं भी अनिश्चय की स्थिति में हूं कि ये पात्र मुझे फिर कभी मिलेंगे या नहीं।
अच्छा, ऐसा देखने में आता है कि आप अलग अलग और नए विषयों और अलग अलग जॉनरो पर लेखन करते हैं। लेखन के लिए विषय और जॉनर आप कैसे चुनते हैं?
लेखन भी मेरे लिए भोजन जैसा आनंददायक है। जैसे कि अलग-अलग प्रांतों का,अलग-अलग देशों का और अलग-अलग शैलियों का खानपान पसंद है, वैसे ही लेखन में विविधिता पसंद है। दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखक विभिन्न जोनर में लिखते हैं। वे एक तरफ अगर विज्ञान कथा लिखते हैं तो दूसरी ओर भूत कथा भी लिखते हैं। मैं इसे लेखक की क्रिएटिविटी की रेंज मानता हूं और अगर मैंने अब तक कुछ शैलियों पर कलम नहीं चलायी है, तो इसे अपनी कमी के रूप में देखता हूं। जब आपकी समझ का प्लेटफॉर्म व्यापक होता है तो उस पर तरह-तरह के विषयों को आने,ठहरने तथा जाने के लिए जगह मिलती है। अक्सर कहानी का कोई विचार एक कांटे की तरह आता है जो या तो अपने आप निकल जाता है या फिर पक कर आपको तकलीफ देने लगता है। फिर उसे कहानी या उपन्यास का रूप देकर निकालने से ही मुक्ति मिलती है।
हाल ही में आपको मिशन ग्रीन वार के लिए हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य सम्मान से भी नवाजा गया। कुछ उस विषय में बताएं।
जी हां, प्रकाशन विभाग से प्रकाशित ‘‘ मिशन ग्रीन वॉर ’’ को 2025 का प्रतिष्ठित हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार मिला है। यह एक साइंस फैन्टेसी है। जो कि कृषि क्षेत्र की अनंत चुनौतियों और असीम संभावनाओं की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। सन 1983 में ‘मेला ’ में प्रकाशित मेरे विज्ञान कथा उपन्यास ‘ जेड.जुइंग की डायरी’ की विषय-वस्तु अंतरिक्ष पर केन्द्रित थी। उस उपन्यास को उस दौर में खूब सराहा गया था। इसलिए अब मैं जमीनी हकीकत पर एक विज्ञान कथा लिखना चाहता था। लेकिन यहां संकट यह था कि कृषि पर कहानी कहीं उबाऊ न हो जाए,इसलिए मैंने इसे एक थ्रिलर का रूप देकर लिखा। अच्छी बात यह है कि पुरस्कार के साथ-साथ यह चर्चित भी हुआ और पहला संस्करण समाप्त होने के बाद अब इसके दूसरे संस्करण का इंतजार है।
सम्मान एक लेखक के लिए आप कितना महत्वपूर्ण मानते हैं। क्या वो लेखन में मदद करता है?
पुरस्कार या सम्मान के मामले में मैं बहुत नीचे पायदान में हूं। मुझे कुल मिलाकर अभी तक 3 या 4 ही पुरस्कार मिले हैं। जबकि कुछ लेखकों के परिचय वाला फ्लैप बताता है कि उन्हें 100 से अधिक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। पुरस्कार से लेखक और पुरस्कार दोनों का सम्मान बढ़ना चाहिए। हिन्दी में पुरस्कार के लिए लिखने को उत्साहित करने वाले पुरस्कार हैं ही कहां?
मुझे तो पुरस्कार का न मिलना भी लेखन या बेहतर लेखन की तरफ प्रोत्साहित करता है। जब अच्छे लेखक पुरस्कार से वंचित होते हैं तो निर्णायकों की समझ पर भी सवाल उठाए जाते हैं।
आप काफी समय से लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। आपने लेखन क्षेत्र में इस दौरान क्या क्या फर्क देखे हैं?
प्रिंट मीडिया सिमटता जा रहा है और ऑडियो तथा ऑडियो -विज्युअल मीडिया विकल्प के रूप में सामने नहीं आ रहा है। इसलिए बाल साहित्य के क्षेत्र में उदासीनता सी नजर आती है। अस्सी और नब्बे के दशक की बात करूं तो उस समय किताबें और पत्र-पत्रिकाएं मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करती थी। तब एक ओर जहां लेखकों के बीच तगड़ी प्रतियोगिता थी तो अवसर भी बहुत सारे थे। तब लेखक गजब की कहानियां कविताएं लिख रहे थे, उनमें विषय की व्यापकता थी। रचनाएं थोपी हुई नहीं लगती थी। आज के दौर में मुझे लगता है कि लेखक पढ़ना और रुचि लेकर अच्छी किताबें खरीदना जरूरी नहीं समझते। विभिन्न भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में लिखे जा रहे बाल साहित्य पर चर्चा की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती। लेखन से नई पीढ़ी भी नदारद है। रचनाओं के मूल्यांकन का स्तर भी वैसा ही है।
कौन से बदलाव लेखन के लिए अच्छे हुए हैं और वो कौन से बदलाव हैं जो आपको लगता है नहीं होने चाहिए थे?
लेखन में बदलाव मेरे लिए व्यक्तिगत चीज है। मैं अब किताबें पढ़ने के साथ ओटीटी पर फिल्में,सिरीज देखने , ऑडियो प्लेटफॉर्म पर कहानी सुनने की तरफ भी मुड़ा हूं। कुछ एनजीओज़ की बाल साहित्य के नाम पर एलीट भूमिका मुझे नागवार लगती है।
लिखने का आपका रुटीन क्या होता है?
मेरा लिखने-पढ़ने का कोई रूटीन नहीं है।
आपने विपुल लेखन किया है। आपकी कौन सी ऐसी रचनाएं हैं जो आपके दिल के ज्यादा नजदीक हैं और क्यों?
जिस दिन यह संतोष हो जाएगा, उस दिन लिखना छोड़ दूंगा। अभी वह आकलन करने का समय नहीं आया है।
आपकी लिखी कुछ रचनाएं जिन्हें आप चाहते हों कि पाठक वर्ग पढ़ें?
मेरी हर रचना मेरे लिए चुनौती होती है। मैं अनावश्यक लिखना ही नहीं चाहता। इसलिए अपेक्षा करता हूं कि मैं जो भी लिखूं , उसे पाठक पढ़ना चाहे। बस, एक जज्बा है कि पहले से बेहतर लिखूं और कुछ ऐसा लिखूं जिस पर दूर-दराज बैठा आम बाल पाठक मुस्कराते हुए पढ़े।
आप खुद भी काफी पढ़ते हैं। हाल ही में पढ़ी गई कुछ पुस्तकें जो आपको पसंद आई हो? क्या आप कुछ के नाम पाठकों से साझा करना चाहेंगे?
वाह मन की बात है यह तो-जापानी लेखक सोसुक नात्सुकावा का ‘THE CAT WHO SAVED BOOKS’, ह्यु लाफ्टिंग की डॉक्टर डूलिटिल सिरीज हाल ही में पढ़ी हैं।मजेदार किताबें हैं। युवा लेखक मित्र सबुज हालदार ने अपनी हॉरर कहानियों /उपन्यासों के साथ मेरे प्रिय बांग्ला बाल साहित्यकार शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय की एक किताब ‘ पागला साहेबेर कबर’ भिजवायी है। सबुज हालदार की ‘मुरांग’ पढ़ना शुरू किया है। उसकी लेखन शैली से चमत्कृत हूं।
आप आजकल क्या लिख रहे हैं? कोई विषय जिस पर लिखने का मन हो? पाठक आगे क्या पढ़ने की उम्मीद लगा सकते हैं?
शब्द कृपणता का अभ्यास कर रहा हूं। कम से कम शब्दों में छोटे से छोटे बच्चों के लिए कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूं। एक विज्ञान कथा लिखने का मन बना रहा हूं।