समीर गांगुली से साक्षात्कार
हिंदी बाल साहित्य के समकालीन परिदृश्य में समीर गाँगुली एक ऐसे सृजनशील, प्रयोगधर्मी और सतत विकसित होते रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिनकी लेखन-यात्रा केवल समय की निरंतरता नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदना और दृष्टि के क्रमिक विस्तार की कहानी भी है। 1970 के दशक में आरंभ हुई उनकी रचनात्मक यात्रा ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे,’प्रारंभिक लेखन का उत्साह, निरंतर सृजन, फिर एक लंबा मौन और उसके बाद नए आत्मविश्वास, परिपक्वता और व्यापक दृष्टिकोण के साथ पुनः साहित्य में वापसी। यह वापसी केवल लेखन में लौटना नहीं, बल्कि अपने भीतर के उस बाल-मन से पुनः जुड़ना है, जो जिज्ञासा, कल्पना और संवेदना का मूल स्रोत होता है।
समीर गाँगुली की रचनात्मकता का सबसे महत्त्वपूर्ण आयाम उनकी विषय-विविधता और निरंतर प्रयोगशीलता है। उन्होंने बाल साहित्य को केवल मनोरंजन या काल्पनिक संसार तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जीवन के यथार्थ, सामाजिक सरोकारों और समकालीन चुनौतियों से भी जोड़ा।
उनके लेखन में जहाँ एक ओर रोमाँच, कौतूहल और कल्पना की उड़ान है, वहीं दूसरी ओर विचार, मूल्यबोध और जीवन-दृष्टि की गहराई भी है।
‘नया घर’ जैसे आरंभिक उपन्यास में संघर्ष और आत्मनिर्भरता का स्वर उभरता है, तो ‘जेड जुइंग की डायरी’ में विज्ञान और कल्पना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
विराम के बाद के दौर में उनकी रचनाओं ने और अधिक व्यापक और समकालीन स्वर ग्रहण किया। ‘रंगीली, बुलेट और वीर’ में उन्होंने ‘स्मार्ट गाँव’ की अवधारणा के माध्यम से ग्रामीण जीवन और विकास की नई संभावनाओं को रेखांकित किया, वहीं ‘मायावन और धन धना धन’ में आर्थिक साक्षरता जैसे जटिल विषय को फैंटेसी के माध्यम से सहज और रोचक बनाया। ‘मिशन ग्रीन वॉर’ में कृषि, विज्ञान और अपराध-रोमाँच का अनोखा संयोजन देखने को मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि बाल साहित्य भी गंभीर विषयों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर सकता है।
उनकी फैंटेसी रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ‘घड़ीघर के समय प्रहरी’, ‘फाइटर मुंडी और दानव का देवलोक’, ‘भू-भू भन-भन भयंकर’ तथा ‘इना, मीना, डिका’ जैसे उपन्यासों में उन्होंने कल्पना के विस्तृत और बहुस्तरीय संसार का सृजन किया है। इन रचनाओं में केवल घटनाओं का रोमाँच नहीं, बल्कि प्रतीकात्मकता, दार्शनिकता और अंतर्निहित अर्थों की गहराई भी विद्यमान है। वे पाठकों को केवल कथा का उपभोग करने के लिए नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे अर्थों को खोजने और अपने स्तर पर नई कल्पनाएँ रचने के लिए प्रेरित करते हैं।
समीर गाँगुली की एक विशिष्ट पहचान यह भी है कि वे बच्चों के लिए लिखते हुए भी वयस्क पाठकों को साथ लेकर चलते हैं। उनकी कहानियों में एक ऐसा द्विस्तरीय कथानक होता है, जिसे बच्चा अपनी कल्पना और अनुभव के अनुसार ग्रहण करता है, जबकि वयस्क उसमें निहित प्रतीकों, सामाजिक संकेतों और जीवन-दर्शन को पहचानते हैं। ‘एक गुलाबी भैंसा, अलग सा’ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें ‘अलगपन’ को हीनता नहीं, बल्कि शक्ति और पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया है यह संदेश आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
लेखन के अतिरिक्त विज्ञापन जगत से उनके जुड़ाव ने उनकी भाषा को संक्षिप्त, प्रभावी और संप्रेषणीय बनाया है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ सरल होते हुए भी प्रभावशाली हैं और पाठकों के मन पर गहरा असर छोड़ती हैं। वे शोध, तैयारी और विषय की गहराई में जाकर लेखन करने में विश्वास रखते हैं, जिससे उनकी कृतियाँ केवल कल्पना-प्रधान नहीं, बल्कि तथ्य और विचार के स्तर पर भी समृद्ध होती हैं।
समकालीन समय में जब बच्चों की रुचियाँ तेजी से बदल रही हैं और डिजिटल माध्यमों का प्रभाव बढ़ रहा है, ऐसे में समीर गाँगुली का लेखन यह विश्वास दिलाता है कि सार्थक और रोचक साहित्य आज भी अपनी जगह बना सकता है। उनकी कृतियाँ न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि सोचने, प्रश्न करने और बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा भी देती हैं।
प्रस्तुत है समीर गाँगुली से एक विशेष संवाद, जिसमें उनके सृजन-संसार, लेखकीय दृष्टि, विषय-चयन, प्रयोगधर्मिता और बाल साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के विविध आयामों को समझने का प्रयास किया गया है।
आशा : आपकी लेखन-यात्रा की शुरुआत किस आंतरिक प्रेरणा या अनुभव से हुई, जिसने आपको बाल साहित्य की ओर स्थायी रूप से मोड़ा?
लंबे अंतराल (2000–2018) के बाद लेखन में लौटना—क्या यह वापसी सहज थी या इसके पीछे कोई विशेष आत्ममंथन रहा?
मेरी मां बहुत अच्छी किस्सागोई करती थी। उस समय की भाषा में उन्हें महा गप्पी कहा जा सकता था। वे अपने बचपन की घटनाओं को अतिशयोक्ति के साथ ऐसे पेश करती थी कि हम सब भाई-बहन एक कल्पना लोक में पहुंच जाते थे। शायद यहीं से मेरे लेखन का अंकुरण हुआ। पिताजी खूब बांग्ला साहित्य पढ़ते थे।इस तरह बचपन में साहित्य की खुशबू महसूस करने लगा था। देहरादून में बचपन बीता। वहां इलाकों के नामों में भी एक तिलस्म था,जैसे कि प्रेमनगर,रांझावाला, तपोवन, अजबपुर। बचपन में हमारे हीरो वो साथी थे जो सबसे ऊंची गप्प हांक सकते थे। बस गप से गल्प की तरफ मुड़ना हो गया। वहीं से लेखक बनने की यात्रा शुरू हो गयी और यह यात्रा अभी भी जारी है। बीच में कुछ वर्षों का पड़ाव था। उस दौरान विज्ञापन लिखते हुए अपनी भाषा को निरंतर तराशा। विभिन्न प्रोडक्ट्स, विभिन्न क्लाइंट्स के लिए विभिन्न माध्यमों से लिखते हुए अपने ज्ञान और विशेषज्ञता के दायरे को व्यापक किया। सन 2018 में पुराने मित्र अखिलेश श्रीवास्तव चमन से अचानक मुलाकात हुई। उसी के आग्रह पर दोबारा लिखना शुरू किया, जिसे संपादकों,साथी लेखकों और पाठकों ने सराहा तो वापसी का बहाना बन गया। पहले लगता था कि मैं बाल साहित्य को जो दे सकता था,दे चुका हूं, लेकिन अब लगा कि नहीं अभी और भी कुछ बाकी है,सो लिखने का सिलसिला जारी है।
आशा : आपके प्रारंभिक और वर्तमान लेखन में दृष्टिकोण के स्तर पर सबसे बड़ा परिवर्तन आप किस रूप में देखते हैं?
पहले मैं केवल शब्दों में लिखता था, फिर रेडियो के लिए नाटक, स्पॉन्सर प्रोग्राम लिखने लगा तो जाना कि ध्वनियों और ‘‘ पॉज’’ में भी बात कही जाती है। रेडियो ने मुझे बेहतर तरीके से संवाद कहने की तमीज सिखाई। एक बार मैं प्रख्यात अभिनेत्री कामिनी कौशल जी के लिए उनके कठपुतली धारावाहिक ‘‘ मां का कर्ज’’ के सीन व डायलॉग्स लिख रहा था,तब वे कई बार टोकती थी-समीर ,दृश्यों में सोचो। कैरेक्टर को दिमाग में लाओ और वो जो कहें उसे लिखो। आप देखेंगी कि मेरी रचनाओं में दृश्यों की सिरीज चलती है। इसे मैं अपने लेखन का एक बड़ा बदलाव मानता हूं।
आशा : ‘नया घर’ जैसे आरंभिक उपन्यास से लेकर आज की कृतियों तक आपकी कथा-भाषा और शिल्प में क्या विकास हुआ है?
मैं हर रचना में अपने को चुनौती देने की कोशिश करता हूं। कोशिश यही रहती है कि कल जो लिखा था आज उससे बेहतर लिखूं।अपना अच्छा खासा आलोचक भी हूं। अपने लेखन से संतुष्ट भी नहीं हो पाता हूं,इसलिए मैं अपने लिखे को अक्सर भूल जाता हूं। वैसे अपने भुलक्कड़पन को मैंने एक सम्मानजनक नाम दे रखा है- अनलर्निंग यानी अपने दिमाग में जमा कचरे को बाहर निकालने की प्रक्रिया। मैं नहीं चाहता कि मेरी रचनाओं को बिना नाम के कोई पढ़े तो अंदाजा लगा सके कि ये मैंने लिखी है। मैं कथानक, भाषा, शैली का कोई पैटर्न बनाना नहीं चाहता। बस इसी दिशा में संघर्ष कर रहा हूं।
आशा : आप अपने उपन्यासों के विषयों का चयन किस आधार पर करते हैं-व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक आवश्यकता या पाठकों की रुचि?
मैं पाठक बहुत अच्छा हूं। तरह-तरह के, देश-विदेश के,विभिन्न भाषाओं के बाल साहित्य के प्रति जिज्ञासा रखता हूं। ओटीटी पर बच्चों की फिल्में और सिरीज देखता हूं। थ्रिलर्स से लेकर विज्ञान कथाओं, भूत कथाओं और फैंटेसी मेरी मानसिक खुराक हैं। प्लॉट कैसे आते हैं यह व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन कोई कथानक अगर मुझे बहुत बेचैन न कर दे तो मैं उसे लिखना शुरू नहीं करता। रचना को पहले एक जिज्ञासु पाठक की तरह ग्रहण करता हूं। उसको निचोड़-निचोड़ कर आनंद पान करता हूं। तृप्ति होने पर ही उसे पाठकों के लिए पेश करता हूं। उपदेश या नसीहत देने से पूरा बैर है। बस चले तो पाठक को उल्टी सलाह देकर उनका आईक्यू टेस्ट करूं। मैं पाठक को हमेशा अपने से ज्यादा सयाना समझ कर चलता हूं
आशा: विज्ञान कथा और फैंटेसी—दोनों विधाओं में आपकी समान पकड़ दिखाई देती है। इन दोनों में लेखन करते समय आपकी मानसिक प्रक्रिया कैसे अलग होती है?
फैन्टेसी को मैं हर कहानी का अंग मानता हूं। कल्पना की जो उड़ान न भर सके, उसकी रचना की दिशा का पाठक सहजता से अंदाजा लगा लेते हैं। यह विधा मेरे दिल के बहुत करीब है। मैं डिज़्ने, मार्बल और डीसी कॉमिक्स की फिल्में देखकर बहुत ही रोमांचित होता हूं। विदेशों में इस क्षेत्र में बहुत ही शानदार काम हुआ है। बांग्ला साहित्य में सुकुमार राय की आबोल ताबोल या एलिस इन वंडरलैंड का भारतीय पर्याय कहलाने वाली रचना ‘हजबरल’ मुझे गजब की एनर्जी और कुछ अच्छा लिखने की प्रेरणा देती है। विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं, इसलिए विज्ञान कथाओं के प्रति भी आकर्षण रहा है। विज्ञान कथाएं वास्तव में तर्कसंगत फैन्टेसी ही है। विज्ञान कथाओं ने बहुत से आविष्कारों को राह दिखाई है। विज्ञान कथाओं को लिखने के लिए विषयगत ज्ञान, शोध की प्रवृति और टर्मिनोलॉजी की जानकारी होना बहुत जरूरी है। मैं मानता हूं कि कल्पना ही दोनों प्रकार की रचनाओं का उद्गम स्थान है।
आशा : ‘मायावन और धन धना धन’ जैसे जटिल विषय (आर्थिक साक्षरता) को बाल साहित्य में रूपांतरित करते समय सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?
मैं मुंबई में रहता हूं। एक समय मेरे ऑफिस से स्टॉक एक्सचेंज बिल्डिंग की दूरी संभवत: 200 मीटर की रही होगी। मेरे कई मित्र शेयर मार्केट के मंजे हुए खिलाड़ी हैं और मैं भी शेयर मार्केट में दिलचस्पी रखता हूं। अच्छा पोर्टफोलियो मैनेज करता हूं। अनेक वर्षों से बिजनेस न्यूज चैनल्स को नियमित रूप से देखता रहता हूं। इक्विटी निवेश के गुरूओं की कई किताबें पढ़ी है। एक दिन मन ने कहा-इस विषय पर कुछ नया लिखो। मैंने सर्च किया कि क्या हिन्दी या किसी भारतीय भाषा या अंग्रेजी में लंबी अवधि के इक्विटी निवेश पर कोई उपन्यास लिखा गया है? मुझे कहीं ऐसा कुछ भी नहीं मिला। बस यह एक चुनौती बन गई। फिर मैंने उपन्यास के माध्यम से दी जा सकने वाली किशोर मन के उपयुक्त जानकारियों को नोट करना शुरू किया। फिर एक रोमांचक फैन्टेसी की कल्पना की,जिससे कि इस नए और थोड़े जटिल विषय को सरलता और रोचकता के साथ पेश किया जा सके। मेरे फैमिली डॉक्टर से लेकर मेरे फायनांस प्लानर तक ने मजेदार जानकारी दी। बस इनका ताना-बाना बुनते हुए मैंने यह उपन्यास लिख दिया,जिसे प्रकाशन विभाग,भारत सरकार ने सन 2022 में प्रकाशित किया। मैं चाहता हूं कि यह उपन्यास समग्र शिक्षा अभियान के जरिए सभी स्कूलों तक पहुंचना चाहिए। अभी तक तो यह नहीं पहुंचा है । आशा है किसी दिन यह स्कूली बच्चों तक अवश्य पहुंचेगा और उनमें आर्थिक साक्षरता का उत्साह जगाएगा।
आशा : ‘मिशन ग्रीन वॉर’ में आपने कृषि और विज्ञान को रोचक कथानक से जोड़ा-क्या यह भविष्य के बाल साहित्य की दिशा हो सकती है?
फरवरी 1981 में उस दौर की प्रख्यात बाल पत्रिका ‘ मेला’ के विज्ञान कथा अंक में मेरा पहला विज्ञान कथा उपन्यास ‘‘ जेड जुइंग की डायरी’ छपा। उस समय मेरी उम्र थी 25 वर्ष। उस अंक में बहुत ही वरिष्ठ कथाकारों जैसे कि आनंद प्रकाश जैन,हरिकृष्ण देवसरे जी की कहानियां भी छपी थी। यह उपन्यास बहुत चर्चित रहा और इसने मुझे विज्ञान कथाकारों की पंक्ति में ला खड़ा किया।लेकिन बहुत से लोगों को यह भी लगा कि यह बांग्ला के किसी प्रतिष्ठित लेखक के उपन्यास का अनुवाद है। खैर, सन 2019 से अपनी दूसरी पारी में स्मार्ट गांव की अवधारणा पर ’रंगीली,बुलेट और वीर’ और शेयर मार्केट की थीम पर ‘मायावन और धन धना धन’ लिखने के बाद मन में आया कि कुछ नया आजमाना चाहिए। फिर विज्ञान कथा पर आकर ठहरा तो विद्रोही मन ने कहा,इस बार हवाई कल्पना नहीं किसी जमीनी हकीकत पर लिखना होगा। कृषि क्षेत्र में मुझे अच्छी गुंजाइश नजर आयी। सिमटती जमीन, बंजर होती जमीन और बढ़ती आबादी, फसलों में प्रदूषण की समस्या जैसी समस्याओं को नोट करके समाधानों पर कुछ शोध और कुछ कल्पना की। लेकिन अब चुनौती थी कि कृषि जैसे रूखे विषय को किशोरों के लिए रोचक कैसे बनाया जाए। इसका समाधान मिला कि अगर इसे एक थ्रिलर के रूप में लिखा जाए तो कैसा रहेगा। फिर लिख डाला। इसे प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया। काफी चर्चित भी हुआ और इसे सन 2025 का हरिकृष्ण देवसरे बालसाहित्य पुरस्कार भी मिला।
आशा : आपकी रचनाओं में प्रतीकात्मकता की गहरी उपस्थिति है-क्या यह सजग योजना होती है या लेखन के दौरान स्वतः विकसित होती है?
मैं बच्चा बनकर लिखने जैसी फिलॉस्फी में यकीन नहीं करता। मुझे बाल साहित्य लिखना एक जिम्मेदारी का काम लगता है। हालांकि लिखकर आनंद पाना पहला ध्येय होता है,मगर अगर मेरे पास पाठक का कौतूहल जगाने का कौशल नहीं है, अगर मैं उसे अपने साथ एक कल्पना लोक में नहीं ले जा सकता,तो मेरे लेखन में कहीं कमी है। इसलिए मैं पूरे संयम और ठहराव के साथ लिखता हूं। विज्ञापन लेखन ने मुझे सिखाया है कि हर शब्द कीमती है उसे अनावश्यक खर्च नहीं करना चाहिए, तभी तो मैं भी अनचाहे विस्तार से बचता हूं। प्रतीकों के रूप में कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह देने का अलग मजा है। और इसमें सजगता बहुत जरूरी है ताकि हम विरोधाभासी बात न कह दें या प्रतीकों में कही बात विपरीत अर्थ न दे।
आशा :‘एक गुलाबी भैंसा, अलग सा’ में ‘अलग होने’ की स्वीकृति का भाव क्या यह समकालीन समाज की मानसिक चुनौतियों का प्रतिबिंब है?
यह भी कुछ अलग तरह का उपन्यास है। आपने कुंग फू पांडा की फिल्में देखी होगी। इसमें हीरो में हीरो जैसे कोई गुण नहीं हैं,लेकिन फिर भी वह सबका प्यारा हीरो है। इन फिल्मों को देखकर मन में कीड़ा कुनबुनाया कि अपन को भी एंटी हीरो को हीरो के रूप में पेश करना है। इस तरह गुलाबी भैंसा अस्तित्व में आया । इसे लिखते समय मैंने ध्यान में रखा कि बच्चे पढ़ें तो उन्हें यह जानवरों की कहानी लगे,लेकिन बड़े लोग पढ़ें तो उन्हें हर पात्र एक प्रतीक के रूप में जीवन दर्शन की बात करता प्रतीत हो।
आशा : विस्तृत और बहुस्तरीय उपन्यास जैसे ‘फाइटर मुंडी और दानव का देवलोक’ लिखते समय कथा-संरचना को संतुलित रखने की आपकी प्रक्रिया क्या रहती है?
विदेशी बाल व किशोर साहित्य में ट्रायोलॉजी लिखने का खूब प्रचलन है। एयरपोर्ट में किसी बुक शॉप पर झांकने पर बच्चों के लिए मोटी-मोटी किताबें देखने को मिलती है, लेकिन हिन्दी बाल साहित्य में ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं देता। पर्सी जैक्सन, हैरी पॉटर जैसे पात्र हिन्दी बाल साहित्य में नहीं आते। मुझे एक बड़े फलक पर , जो देश की सीमाओं से बाहर तक फैला हो जिसमें बहुत सारे पात्र हों( 50 तक), जिसमें कथानक धरती, आकाश और पाताल तक फैला हो, जिसमें विज्ञान भी हो, मिथक भी हो और फैन्टेसी का बोलवाला हो, कथानक में निरंतरता के साथ काफी फैलाव हो, इस सोच के साथ लगभग एक साल का समय लेते हुए मैंने 75 हजार से अधिक शब्दों का यह उपन्यास लिखा। प्रकाशक की इसे शीघ्र ही मांगा/एनीमे कॉमिक्स में पेश करने की योजना है।
आशा : बच्चों के लिए लिखते समय भाषा को सरल रखते हुए भी विचारों की गहराई बनाए रखना-आप इसे कैसे साधते हैं?
जब विचारों में स्पष्टता होती है तो भाषा भी सरल रहती है। सहज बात ही गहरा असर करती है। भाषा की कसरत बाल साहित्य में कितनी प्रयोजनीय है पता नहीं। शब्दों की लफ्फाजी बड़ों को भले ही प्रभावित कर दे लेकिन बच्चों को तो कहानी में 24 कैरेट कहानी ही चाहिए। और कहानी अगर उसकी तर्कशक्ति को चुनौती दे तो यकीन मानिए उन्हें खुशी होगी,वे साहित्य से दूर नहीं होंगे।
आशा : वर्तमान डिजिटल युग में बच्चों की पढ़ने की आदतों में जो बदलाव आया है, वह आपके लेखन को किस प्रकार प्रभावित करता है?
आज हमारा सामना इंटेलिजेन्ट बच्चों से हो रहा है, उन्हें इंटेलीजेन्ट रचनाएं चाहिए। मैं जब पढ़ता हूं तो बच्चे की तरह पढ़ता हूं, लेकिन लिखता तो बड़ा बनकर ही हूं। आज पत्रिकाएं मनोरंजन का प्रमुख माध्यम नहीं है।ऑडियो और वीडियो माध्यम भी उसे मनोरंजन प्रदान कर रहे हैं। मैं ओटीटी या ऑडिबल, स्पाटिफाई जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यमों से नए दौर से जुड़े रहने,उसे समझने की कोशिश करता हूं।अच्छा पढ़ना, अच्छा लिखने की शर्त होती है।
आशा : आप अपने समकालीन बाल साहित्य और अपनी रचनात्मक दृष्टि के बीच क्या मूलभूत अंतर महसूस करते हैं? विशेषतः विषय-चयन, भाषा, और बच्चों के प्रति दृष्टिकोण के स्तर पर आप स्वयं को कहाँ अलग पाते हैं?”
हिन्दी के ज्यादातर बाल साहित्यकार बाल साहित्य भी लिखते हैं, लेकिन मैं सिर्फ और सिर्फ बाल साहित्य ही लिखता हूं। इसलिए मेरा पठन-पाठन भी बाल साहित्य पर केन्द्रित रहता है।जहां तक साहित्य से लेन-देन का सवाल है, मैं बाल साहित्य को कुछ दे रहा हूं, इस मुगालते में मैं बिलकुल नहीं रहता। लिखना और लीक से हटकर लिखना मुझे आनंदित करता है।शुरू से ही मेरा प्रयास रहा है कि वो लिखूं जो दूसरे नहीं लिख रहे हैं। मैं यह मानता हूं कि बाल साहित्यकार को वर्सेटाइल होना चाहिए। अगर हम विषय,भाषा,शैली, परिवेश,विधा के दायरों में अपने को बांध लेंगे तो हमारा लेखन सीमित या संकुचित हो जाएगा। मुझे लगता है कि बाल साहित्य पर बौद्धिकता हावी नहीं होनी चाहिए।शिक्षाप्रद कहानी का जुमला अक्सर दोहराया जाता है,साहित्य के मैदान में जिस दिन मनोरंजनप्रद की एंट्री होगी, उस दिन खेल थोड़ा और रोमांचक होगा।
आशा : एक बाल साहित्यकार के रूप में आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?
बाल साहित्यकार समाज सुधारक नहीं है। उसे बच्चे को सिखाने का भ्रम छोड़कर उससे सीखने का प्रयास करना चाहिए। बड़ा सतही और थोपा हुआ लगता है जब कोई कहता है कि हमें अंधविश्वास फैलाने वाली रचनाएं नहीं लिखनी चाहिए। सच तो यह है कि हमें अपने बाल पाठकों, उनकी सोच-समझ पर भरोसा करना होगा। किसी कहानी,उपन्यास के रोमांच,आनंद को तो वे मुक्त भाव से ग्रहण करेंगे, लेकिन आप कोई असंभव या अतार्किक बात कहेंगे तो वे अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करेंगे। मैं बचपन में चंदामामा का पाठक रहा हूं। मेरे घर में गीता प्रेस की पत्रिका कल्याण भी आती रही है। इन पत्रिकाओं ने न तो मुझे अंधविश्वासी बनाया है और न ही बैरागी। बस मुझे भरपूर आनंद मिला है। एक जिम्मेदार बाल साहित्यकार के रूप में मैं अपनी रचनाओं से बच्चों में कौतूहल पैदा करना चाहूंगा। मैं चाहूंगा कि वे मेरी दृष्टि पर सवाल उठाएं। वे कभी समानांतर सोचें तो कभी वो सब कल्पनाएं भी करें,जिनसे मैं चूक गया हूं।
बाल साहित्य के क्षेत्र में वे कौन से लेखक हैं जिन्होंने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है? उनके लेखन की कौन-सी विशेषताएँ-जैसे कथ्य, शिल्प, या दृष्टि-आपको अपनी रचना-प्रक्रिया में प्रेरित करती हैं?”
देश विदेश के अनेक लेखकों के लेखन से प्रभावित रहा हूं और यह सूची समय-समय पर बदलती रही है। अंग्रेजी बाल साहित्य में एनिड ब्लाइटन से शुरू करके रोआल्ड डल, लुइस केरॉल,जे के रोलिंग्स,ह्यूग लाफ्टिंग, भारतीय बाल साहित्य में मनहर चौहान, रस्किन बॉण्ड, हरिकृष्ण देवसरे, मनोहर वर्मा, के.पी.सक्सेना, सुकुमार रॉय, लीला मजुमदार, सुकुमार रॉय, शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय,आनंदप्रकाश जैन, रामेन्द्र कुमार, राजीव तांबे, पुष्पाबेन अंतानी तथा अनेक दूसरे लेखक हैं। नाम याद रखने के मामले में मैं बहुत कमजोर हूं। थोड़ी देर बाद मुझे याद आएगा कि ये लेखक तो छूट गए हैं। आजकल मेरा फोकस नेटफ्लिक्स तथा दूसरे ओटीटी चैनल्स पर दिखाई जाने वाली बच्चों की फिल्मों और सिरीज पर है। वहां बहुत कुछ अद्भुत मिल रहा है।
आशा : आपके आगामी प्रकाशनाधीन उपन्यासों में पाठकों को किस तरह के नए विषय या प्रयोग देखने को मिलेंगे?
ये तो समय बताएगा। कुछ उपन्यास प्रकाशनाधीन हैं, छपने के बाद ही उन पर चर्चा हो तो बेहतर होगा। हां, अवश्य अब तक खुद को दोहराने से बचा हूं। मैं लेखन में प्रेडिक्टेबल नहीं होना चाहता। लेखन में समय के साथ परिपक्वता आनी चाहिए। जब मुझे लगेगा कि मेरे पास कहने को कुछ नया नहीं है तो मैं खुद लिखने के बजाय दूसरों का अच्छा लिखा पढ़ना चाहूंगा।
आशा : आपके साहित्यिक वरिष्ठों ने आपकी लेखन-दृष्टि को किस प्रकार आकार दिया? अथवा आपको कैसे प्रभावित किया? उनसे मिली कौन-सी सीखें आज भी आपके सृजन में सक्रिय रूप से उपस्थित हैं?”
मुझे बहुत से वरिष्ठ लेखकों और संपादकों का स्नेह तथा मार्गदर्शन मिला है। देहरादून में बिताए शुरूआती 30 वर्षों के दौरान शशिप्रभा शास्त्री, रवीन्द्रनाथ त्यागी, भीमसेन त्यागी और उसके बाद के.पी.सक्सेना,अनंत पै, डॉ.राष्ट्रबंधु, योगेन्द्र कुमार लल्ला, परेशनाथ, राजेन्द्र भट्ट, आनंदप्रकाश जैन, कन्हैया लाल नंदन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हरिकृष्ण देवसरे, देवेन मेवाड़ी, शरद जोशी आदि से सीखने-समझने का मौका मिला है। समकालीनों में जयंती रंगनाथन, जितेन ठाकुर, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, सुरेन्द्र विक्रम, विकास दवे, संजीव जायसवाल‘संजय’, सूर्यनाथ सिंह, दिविक रमेश, नरेन्द्र निर्मल, शिवदयाल ,निश्चल, ॠतुश्री आदि से नियमित चर्चाओं ने मुझे समृद्ध किया है।
आशा : क्या कभी कोई कहानी लिखते समय आप स्वयं भावुक होकर रुक गए हों?
मैं काफी संवेदनशील हूं। कहानी पढ़ते हुए, सिनेमा देखते हुए उस दौर, घटनाक्रम को जीने लगता हूं। कहानी लिखते हुए पात्रों की मानसिकता को समझना तथा उसके अनुसार उनसे व्यवहार कराना प्रयोजनीय होता है। अजीब दुविधा से गुजरता हूं मैं। एक ओर तो कठपुतली का खेल दिखाने वाले की भूमिका में आकर सारे पात्रों की बागडोर संभालता हूं तो दूसरी तरफ पात्रों में समाकर उनके मनोविज्ञान के अनुसार व्यवहार करता हूं। कभी-कभी तटस्थ दृष्टाभाव भी कहानी को जन्म देता है। एक कहानी की जन्म कथा सुनाता हूं। यही कोई उन्नीस सौ अस्सी का दशक रहा होगा। मैं अंबाला से देहरादून लौट रहा था। बस जगाधरी या यमुनानगर के बाजार से गुजर रही थी। बस जाम में फंस कर चींटी चाल से आगे बढ़ रही थी। मैंने खिड़की से झांक कर देखा। कुछ लोग एक अर्थी को लेकर जा रहे थे। शवयात्रियों और तमाशबीनों की काफी भीड़ थी, उस कारण से रास्ता रुक गया था। मैंने देखा, यह एक युवक की लाश थी। फिर बस आगे बढ़ गई। कुछ आगे मेरी नजर दो संपेरों पर पड़ी जो शक्ल से ही शातिर नजर आ रहे थे। खैर बस आगे बढ़ गई और फिर दोनों दृश्य पीछे छूट गए। लेकिन अगली कुछ रातों में दोनों दृश्य दिमाग में गड्ड-मड्ड होकर कहानी का रूप लेने लगे। सांप के काटने से युवक की मृत्यु। एक संपेरा का दावा,-मैं इसे जिन्दा कर सकता हूं। लोगों में कौतूहल। और फिर क्लाईमेक्स। मैंने कहानी लिखी- तमाशा मौत का। एक किशोर कथा। ये पराग में छपी और खूब सराही गई। इसके अलावा कई कहानियों में नैतिकता की भावुकता ने मुझे कहानी को बीच में ही छोड़ देने को बाध्य किया। यहां डर था कि कोई गलत संदेश न जाए।
आशा : भारतीय बाल साहित्य की वैश्विक बाल साहित्य से तुलना करें तो आप किस क्षेत्र में इसे अधिक सशक्त मानते हैं और कहाँ सुधार की आवश्यकता देखते हैं?
जागरुकता मुझे विश्व बाल साहित्य तथा प्रादेशिक बाल साहित्य की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है। इसलिए मैं भारत में अंग्रेजी,मराठी,गुजराती और बांग्ला के वरिष्ठ तथा पुवा साहित्यकारों के साथ जुड़ा हूं। उनके साथ चर्चा में बाल साहित्य के एक व्यापक फलक की जानकारी मिलती रहती है। ऐसे में जब हिन्दी का कोई अनुभवी बाल साहित्यकार कहता है कि वर्तमान में बहुत अच्छा बाल साहित्य रचा जा रहा है तो मैं उससे सहमत नहीं हो पाता। दुनिया भर में बहुत ही आधुनिक सोच, कथानक और शैली के साथ बाल साहित्य लिखा जा रहा है। इन भाषाओं में हार्ड बाउंड में आकर्षक कलेवर के साथ पुस्तकों का आना एक आम बात है। फैन्टेसी, साइंस फिक्शन और थ्रिलर्स में ट्रायोलाजियां लिखी जा रही है। हिन्दी में इनकी चर्चा भी नहीं हो रही है। कुछ मंचों पर इनकी चर्चा और चिंता होनी चाहिए, लेकिन कुछ मंचों पर बार-बार वही चेहरे दिखाई देते हैं,वही बात-बार दोहराई जाती है। इन मंचों पर सामयिक विषयों पर अच्छा लिखने वाले लेखकों की भागीदारी होनी चाहिए। समीक्षा के क्षेत्र को विश्वसनीय बनना पड़ेगा। शोध कार्य और पाठ्यक्रम में रचनाओं के शामिल होने की लालसा से बचना होगा। बाल साहित्यकार के पुरस्कारों को भी सम्मानजनक होने की जरूरत है। सूचना व प्रसारण मंत्रालय का भारतेन्दु पुरस्कार कई वर्षों से नहीं दिया जा रहा है, उसे फिर से पुनर्जीवित किए जाने की बाल साहित्य के मंचों से आवाज उठाई जानी चाहिए।
आशा : क्या बाल साहित्य को बच्चों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए बाजार-आधारित आकर्षण, डिजिटल माध्यमों और लोकप्रिय ट्रेंड्स का सहारा लेना आवश्यक है, या फिर इससे साहित्य की मूल संवेदना और गहराई के क्षरण का खतरा भी पैदा हो सकता है?
बाल साहित्य आज प्रिंट मीडियम यानी पत्र-पत्रिकाओं के दायरे से काफी आगे निकल चुका है।ऑडियो,वीडियो के साथ-साथ डिजिटल क्रांति और अब एआई की दस्तक के साथ पारंपरिक लेखन और लेखक की दुनिया में तूफान आने वाला है। कटु सत्य है यह उन लेखकों को अप्रासंगिक कर देता जो इस बदलाव के साथ अपने को नहीं ढालते हैं। मैं देखता हूं कि हिन्दी के बहुत से बाल साहित्यकार आज भी कंप्यूटर और इंटरनेट से अनभिज्ञ हैं। एक बुजुर्ग लेखिका को तो मैंने एक बड़े बाल साहित्यकार की इसलिए प्रशंसा करते सुना था क्योंकि वे फेसबुक और इंस्टाग्राम पर नहीं हैं। लेखक को एआई की क्षमता का सही उपयोग करना सीखना होगा। उससे एक कदम आगे रहना होगा। दरअसल नए माध्यम और नए ट्रेंड्स प्रचूर संभावनाएं लेकर आ रहे हैं। वे प्रतिभावान लेखक को वैश्विक प्लेटफॉर्म देंगे। मैं कल्पना करता हूं कि कल मेरी रचनाएं कोरियाई या चीनी/जापानी पाठकों तक पहुंचेंगी। लेकिन इसके लिए हमें उन माध्यमों को सीखना होगा,समझना होगा और नकारने की प्रवृत्ति से बचना होगा।
आशा : हिन्दी बाल साहित्य की बेहतरी के लिए कुछ सुझाव देना चाहेंगे?
विभिन्न भारतीय भाषाओं के बाल साहित्यकारों के बीच संवाद होना बहुत जरूरी है। विभिन्न विश्वविद्यालयों को चाहिए कि तमाम भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को अपनी लाइब्रेरियों में स्थान दे। लेखकों के साथ परिसंवाद आयोजित करे। सरकारी प्रकाशनों यथा नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग,साहित्य अकादमी बाल साहित्य प्रकाशन, उसके संवर्द्धन में बाल साहित्यकारों की भूमिका पर विचार करे। लेखकों को अपनी तरफ से भी दूसरी भारतीय भाषाओं के लेखकों के साथ संपर्क करके उनकी भाषा के बाल साहित्य के प्रति दिलचस्पी दिखानी चाहिए। हिन्दी के बाल साहित्यकारों को विशेष रूप से बाल साहित्य लिखने से ज्यादा दिलचस्पी अच्छा बाल साहित्य पढ़ने में दिखानी चाहिए। मेरा सामना ऐसे कई तथाकथित बाल साहित्यकारों से हुआ है जो बाल साहित्य की पत्रिकाएं,पुस्तकें खरीदने की बिलकुल जरूरत नहीं समझते हैं। अपनी किताब प्रकाशित करवाने की हड़बड़ी रहती है और पैसा लेकर किताब छापने वाले प्रकाशक की तलाश में रहते हैं। बहुत ज्यादा मात्रा में हिन्दी बाल साहित्य के प्रकाशन और यारी-दोस्ती वाली समीक्षा से भी बाल साहित्य को नुकसान हो रहा है। बस इतना काफी है बाल साहित्य के शुभचिंतकों के लिए।