✦ समीर गांगुली हिंदी बाल साहित्यकार
मेरी लेखन प्रक्रिया : समीर गांगुली | समीर गाँगुली
लेखकीय यात्रा

मेरी लेखन प्रक्रिया

समीर गांगुली

✒पढ़ना और लिखने की शुरुआत

मेरा लिखना एक लेखन प्रक्रिया का परिणाम ही तो है, फिर भी मैं इस विषय पर अवश्य ही कुछ और कहना चाहूंगा, वह भी विशेष रूप से मेरे द्वारा लिखे गए बाल उपन्यासों के संदर्भ में।

साहित्य लेखन के लिए पढ़ना जरूरी है। जब आप पढ़ेंगे तभी तो आपके मन में लेखन की चाह पैदा होगी।

कभी ऐसा सोचकर – अरे ऐसा लिखना कौन सी बड़ी बात है। ऐसा लिखा अगर छप सकता है तो मैं क्यों ना लिखूं। मैं तो इससे थोड़ा बेहतर ही लिख सकता हूं।

और कभी यह सोचकर -अरे क्या कमाल का लिखा है अमुक लेखक ने। चलो , मैं भी ऐसा ही लिखने की कोशिश करता हूं। लेकिन पहले थोड़ा और पढ़ कर अपने को संवार लूं।

जहां तक मेरी लेखन प्रक्रिया का सवाल है, मेरे मन में कई बार यह प्रश्न उत्पन्न हुआ है कि मैं लिखता क्यों हूं?

और तमाम संभावित जवाबों को खारिज करते हुए मुझे हर बार यही जवाब मिलता है कि आनंद पाने के लिए।

✒बाल साहित्य से जुड़ाव

मैंने विधिवत लेखन सन 1973-75 के दौरान किया। शुरूआत बाल साहित्य से की। कुछ समय बाद उस समय की प्रतिष्ठित बाल पत्र पत्रिकाओं में छपने का सिलसिला शुरू हो गया। इनमें से कुछ पत्रिकाएं थीं-चंपक,पराग,लोटपोट, मेला, बालक, मधु मुस्कान तथा दैनिक समाचार पत्रों के रविवारीय परिशिष्ट। जल्द ही एक बाल साहित्यकार के रूप में पहचान भी बनने लगी।

उसी दौरान एक बार पराग के दफ्तर में जाना हुआ। याद नहीं उस समय संपादक कौन होंगे,शायद यह सन 1980 के आसपास का समय होगा। संपादक से मुलाकात करने से पहले मैं उप संपादक की मेज के दूसरी तरफ बैठा था। वो एक आकर्षक, शालीन महिला थी। उन्होंने मुझसे कहा,‘‘ समीर, अब तुम्हारा थोड़ा बहुत नाम होने लगा है। देखना अब जल्द ही तुम बड़ों के लिए लिखने लगोगे। शायद उसमें नाम भी कमाओगे। दरअसल नए लेखक बाल साहित्य को लेखन की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करते हैं।और इससे बाल साहित्य का बहुत नुकसान हो रहा है। उनकी बात मुझे दिल तक छू गई। पच्चीस-छब्बीस साल का नवलेखक थोड़ा भावुक भी होता है। सो मैंने उसी पल खुद से और उनसे वादा किया कि मैं हमेशा केवल बाल साहित्य ही लिखूंगा। मुझे खुशी है कि मैंने अपनी बात का मान रखा है। प्रसंगवश बता दूं कि उस उप संपादक का नाम था ज्योत्सना आनंद। मैं उनसे इसके बाद कभी नहीं मिल पाया। बस हाल ही में आदरणीया क्षमा शर्मा जी के वॉल से जाना कि वे प्रतिष्ठित साहित्यकार व संपादक मधुसूदन आनंद जी की पत्नी थीं।

मैंने कभी कभार बड़ों के लिए जो भी लिखा वह कमर्शियल लेखन है। उसके बारे में बातचीत फिर कभी।

✒पढ़ना, सीखना और अनलर्निंग

चलिए अब मूल मुद्‍दे पर आते हैं। यानी मेरे लिखने की प्रक्रिया। मैं लेखक चाहे जैसा भी होऊं, पढ़ाकू अच्छा हूं और अकसर बिना किसी पूर्वाग्रह के। विचारधारा या सोच या जोनर के प्रति भी कोई पूर्वाग्रह नहीं। शुरूआती दौर में यानी जब 25 -40 की उम्र का था,तब नियम बना रखा था कि रोज कम से कम एक कहानी तो पढ़नी ही है और हफ्ते में एक उपन्यास तो पढ़ना ही है। उस दौर, बल्कि उस दौर में हिन्दी, बांग्ला और अंग्रेजी के क्लासिक्स को खोज खोज कर पढ़ा। कई अन्य विदेशी भाषाओं जैसे कि रूसी,चीनी, जर्मन, जापानी आदि के अनुवाद पढ़े। इससे समझ का दायरा बढ़ा। भाषा की नई-नई शैलियों और विषयों से परिचय हुआ।

इससे एक और फायदा यह हुआ कि सामान्य या औसत लेखन से प्रभावित होना छूट गया।

मैं अक्सर अपने लिखे से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाता हूं। कई बार कहानी या उपन्यास के छपने के बाद लगता है, इसे दूसरी तरह से लिखा जाना चाहिए था। कुछ पात्रों की उलट-पुलट भी दिमाग में आती है। शुक्र यह है कि मैं शुरू से ही पढ़े हुए उपन्यासों को याद नहीं रख पाता हूं। इसे मैं ‘Unlearning’ यानी दिमाग को खाली करने का तरीका कह सकता हूं। वैसे यह भुलक्‍कड़पन नहीं है। अपने लिखे के साथ भी ऐसा ही होता है। मेरी लिखी करीब 30-35 कहानियों का मेरे पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। कुछ कहानियां अचानक से याद आती है, लेकिन उन्हें मैं खो चुका हूं। लेकिन उनके प्रति मन में कोई मोह भी नहीं है,क्योंकि मैं सोचता हूं कि अगर वे उत्कृष्ट कोटि की होती तो पाठक उसे याद रखते, वह पब्लिक डोमेन में कहीं न कहीं तो उपलब्ध होती। हां, कुछ खोई रचनाओं ने फिर से द्वार पर दस्तक दी है।

✒विचार से उपन्यास तक

शायद आप जानना चाहें कि उपन्यास लिखने की शुरूआत कैसे होती है? मैं कहूंगा,जैसे आकाश में किसी दिन बादल का एक टुकड़ा नजर आता है, ठीक उसी तरह एक आवारा विचार मन में उमड़ आता है अचानक,अनायास। यह शब्द, वाक्य, संवाद के रूप में भी हो सकता है या फिर दृश्य या बिंब के रूप में। कई बार लोगों से बातचीत में सुने किस्से, आसपास घटी घटनाएं, समाचारों में कुछ सनसनीखेज बात भी प्रेरणा बनती है। कई बार रेडियो,टीवी या ओटीटी पर कोई नाटक,धारावाहिक, सिरीज या फिल्म देखते हुए भी कथानक का सूत्र मिलता है। अगर वह पैरेलल थीम है तो पैर पर चिपक गई जोंक की तरह उसे तुरंत झटकना बहुत जरूरी है । अगर उसके मोह में पड़ गए कि रेडीमेट माल मिल गया तो ये आत्मघाती कदम हो सकता है, यह मेरा अपना विचार है। हो सकता है कई लेखक इससे सहमत न हों।

एक उदाहरण देकर अपनी बात कहता हूं। मेरा एक बाल उपन्यास है-एक गुलाबी भैंसा,अलग सा। दरअसल कुंग-फू पांडा फिल्मों ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। तीनों ही फिल्मों को देखकर मैं रोमांचित था।यह उस हीरो की कहानी थी जो कुदरती रूप में हीरो का स्टफ यानी माल-मसाला नहीं था। बस उसकी इच्छा शक्ति और जर्नी उसे समाज का हीरो बनाती है। मेरे भी मन में आया, मैं एक मोटिवेशनल उपन्यास लिखूंगा,जिसका हीरो शारीरिक रूप से शक्‍तिशाली नहीं होगा। उसकी सामाजिक मान्यता भी नहीं होगी,बल्कि वह वंचित की श्रेणी में होगा, लेकिन उसके मन में एक निर्मलता होगी, वह सदा खुश रहने वाला होगा और वह अपने को जानने की यात्रा पर निकलेगा। मैं जब इतनी फिलॉस्फी सोच रहा था तो मन सावधान भी कर रहा था-लेखक तुम्हें बच्चों के लिए लिखना है, उपन्यास अगर मनोरंजक नहीं होगा, उसमें कल्पना-कौतूहल नहीं होगा तो बच्चे क्यों पढ़ेंगे?

सो मैंने तय किया कि मैं दोहरे प्लेटफॉर्म पर इस उपन्यास को लिखूंगा। यानी जब बच्चें इसे पढ़ेंगे तो उन्हें यह एक बौने रह गए गुलाबी रंग के भैंसे की कहानी लगेगी, लेकिन जब बड़े इसे पढ़ेंगे तो हर पात्र, उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया सांकेतिक लगेगी। काले शक्तिशाली जंगली भैंसों के दल में यह भेड़े जितना बौना गुलाबी रंग का भैंसा, दुनिया में कमजोर और वंचित वर्ग का प्रतिनिधि लगेगा। यह कहानी उन्हें एक कमजोर प्राणी के अपने अस्तित्व को सार्थक रूप देने की कहानी लगेगी। इस उपन्यास को छोटे तथा बड़े पाठकों दोनों ने ही सराहा है। इसके अंग्रेजी और मराठी माषा में अनुवाद भी आ चुके हैं।

✒कथानक, पात्र और शोध

मेरा प्रकाशन विभाग से सन 2021 में प्रकाशित एक उपन्यास है ‘‘ रंगीली,बुलेट और वीर’’। इसे फिक्की ने सन 2023 में ’’ चिल्ड्रन्स बुक ऑफ द ईयर ’’ से सम्मानित किया। इसका विचार कुछ यूं आया कि उन दिनों स्मार्ट सिटी की चर्चा जोरों पर थी। मैंने सोचा, भारत तो गांवों का देश है, इसलिए यहां इकाई शहर के बदले गांव को मानना बेहतर होगा। इसलिए गांव की पृष्ठभूमि पर बच्चों के एक उपन्यास को लिखने की इच्छा हुई। आप भले ही यह मानकर चलें,कि उपदेशात्मक नहीं रहना है, बच्चों पर अपने विचार थोपना नहीं है, उन्हें वास्तविकता की झलक तो दिखानी है, लेकिन एक मोहक, कौतूहल से भरी कहानी के जरिए। इसलिए मैंने इस कहानी को तीन मुख्य पात्रों वीर- एक लड़का, रंगीली-एक दुर्लभ प्रजाति की चिड़िया और बुलेट-एक छोटा सा प्यारा,मगर शरारती कुत्ता के जरिए कही। तथ्यों और फैंटेसी का संतुलन बनाते हुए कहानी कही। अपने बचपन के गांव को कल्पना के चित्रों से रंगकर आदर्श यानी स्मार्ट गांव के रूप में पेश किया।

उपन्यास लिखते समय मैं कथानक की मांग के अनुसार एक ढांचा गढ़ लेता हूं। यह पात्रों,घटनाओं और प्रवाह से संबंधित होता है। अगर विषय की मांग हो तो खोज या रिसर्च कार्य करता हूं,उन्हें डायरी या पन्ने में नोट करता हूं। कई बार विषय के जानकारों के साथ चर्चा की कर लेता हूं,ताकि तथ्यात्मक भूलें कम से कम हों। इस दौरान समझ में आ जाता है कि यह उपन्यास किस वर्ग के बच्चों के लिए है,सो भाषा,शैली, घटना-क्रम, चित्रात्मकता उसी के अनुसार रखता हूं।हां, मैं हर पात्र के चरित्र की खूबी-खामियों, मैनिरिज्‍म, बोलने के तरीके,भाषा पर पूरा ध्यान देता हूं। ना जीवन में और न ही किस्से-कहानियों में दो पात्र एक तरीके से बात करते हैं। इसलिए पूरे उपन्यास में इसके निर्वाह का ध्यान रखता हूं।

आज बाल साहित्य का प्लेटफॉर्म काफी व्यापक हो गया है। आपका उपन्यास केवल छपे हुए शब्दों की किताब तक सीमित रहने के लिए नहीं है। ऑडियो बुक, ऑडियो-वीडियो यानी फिल्म, ओटीटी सिरीज के रूप में आने की उसमें संभावनाएं होती हैं। इसलिए, मैं हर रचना में इस पहलू को ध्यान में रखता हूं। शब्दों में चित्रों में बदलने की क्षमता या अनुकूलता होनी चाहिए।

प्रकाशन विभाग से ही प्रकाशित ‘‘ मिशन ग्रीन वॉर’’( सन 2025 में हरिकृष्ण देवसरे पुरस्कार से सम्मानित) को मैंने कृषि जगत की वर्तमान-भावी चुनौतियों और संभावनाओं पर केन्द्रित करते हुए लिखा। मुझे लगा कि इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए थ्रिलर के रूप में लिखा जाना चाहिए, सो इसमें विज्ञान कथा, फैन्टेसी और ध्रिलर तीनों चीजों का समावेश है। इस उपन्यास को पाठकों ने खूब पसंद किया है और फिलहाल आउट ऑफ प्रिंट है।

✒विषयों और विधाओं की यात्रा

इसके बाद मैं आर्थिक साक्षरता पर एक उपन्यास लिखना चाहता था। सर्च किया तो पता चला कि किसी भी भारतीय भाषा में अब तक इस विषय पर नहीं लिखा गया है। शेयर मार्केट की थोड़ी बहुत जानकारी रखता हूं। करीब चालीस वर्षों से इस क्षेत्र को निकटता से देख रहा हूं। शेयर्स की खरीद-बिक्री भी करता हूं।अच्छो पोर्टफोलियो है। कई मित्र भी इस क्षेत्र के धाकड़ खिलाड़ी हैं, सो इक्‍विटी मार्केट में लॉन्ग टर्म इंवेस्टेमेन्ट के फायदे के बारे में एक फैन्टेसी के रूप में किशोर उपन्यास लिखा। इसका नाम है- मायावन और धन धना धन।

मैं यह मानता हूं कि हम जिस विषय पर लिखें , उसका डोमेन नॉलेज यानी विषयगत ज्ञान होना चाहिए। नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है।

एक बात और मैं यह मानता हूं लेखक का बहुमुखी विकास विभिन्न विषयों पर विभिन्न शैलियों और विभिन्न जोनर पर लिखने से होता है। इसलिए मैं संकुचित दृष्टिकोण अपनाए बिना विभिन्न प्रकार का लेखन करने की कोशिश करता हूं। प्रयोगशील रहने की कोशिश करता हूं। इससे मुझे आत्म संतुष्टि मिलती है जो कि मेरे लिए किसी प्रशंसा या पुरस्कार से अधिक मायने रखती है।

जैसे कि फैन्टेसी को ही लें तो यह मेरी प्रिय विधा है। दुनिया के अनेक फैन्टेसी लेखक मेरे प्रिय कथाकार हैं। एडगर एलन पो से लेकर रिक रॉयडन और जे जे रोलिंग्स तक। मेरा फ्लाईड्रीम्स से प्रकाशित उपन्यास ‘‘ फाइटर मुंडी और दानव का देवलोक’’ एक फैन्टेसी उपन्यास है। इसे लिखते समय मैं स्पष्ट था कि मुझे एक बड़े कलेवर में ढेर सारे पात्रों, ढेर सारी घटनाओं और दुनिया भर को ही बल्कि पूरे ब्रह्मांड को समटते हुए एक बड़े आकार का उपन्यास लिखना है। यह सत्तर हजार से अधिक शब्दों का 50 से अधिक पात्रों वाला किशोर उपन्यास है,जिसकी कहानी के तार दुनिया के कई देशों तक फैले हैं। वैसे इसे लिखने में मुझे एक साल से अधिक का समय लगा। इस उपन्यास को लिखते समय मैंने रिसर्च वर्क भी खूब किया। वाकई इसे लिखते हुए मुझे बहुत मजा आया और यह उपन्यास मेरे दिल के बहुत करीब है। मैं जानता हूं कि किसी दिन यह दूसरे माध्यमों के जरिए भी पाठकों तक पहुंचेगा।

✒फैंटेसी और रचनात्मक प्रयोग

मैंने कुछ फैन्टेसी उपन्यासों पर भी काम किया है। फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशन्स ने फाइटर मुंडी और दानव का देवलोक के अलावा मेरे तीन अन्य फैन्टेसी उपन्यास भी प्रकाशित किए हैं। घड़ीघर के समय-प्रहरी, भूभू भनभन भयंकर और ईना,मीना डिका। मैंने पूरी कोशिश की है कि यहां कथानक, लेखन शैली आदि में दोहराव न हो।

अगर पाठक आपकी रचना को पढ़ते समय आगे की कहानी का पूर्वानुमान लगा लेते हैं तो यह लेखक के रूप में आपकी कमजोरी है। लेखक को ऐसा परोसिये कि वह उसी के रस में डूबा रहे। उसे कुछ भी सोचने का मौका मत दीजिए कहानी को पढ़ते समय।

मुझे लगता है बस यहीं बात को विराम देना चाहिए। कुछ और उपन्यास प्रकाशनाधीन हैं, उन पर चर्चा फिर कभी।

समीर गांगुली की लेखन यात्रा